हनुमान जयन्‍ती

विद्या, बुद्धि और बल के सागर हनुमानजी की रामभक्ति अनुपम है। वे ज्ञानियों में अग्रगण्‍य हैं व भक्‍तों में सर्वप्रथम और कर्मयोगियों के लिए परम प्रेरक हैं। वे हमें चरित्र और धर्म की रक्षा का शाश्‍वत पाठ पढ़ाते हैं तो सदा कर्म उपासना की प्रेरणा भी देते हैं, वहीं प्रभु श्रीराम के चरणों में अपार श्रृद्धा और भक्ति भी।

कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ''रूप चतुर्दशी'' के साथ ही हनुमान जयन्‍ती भी मनाई जाती है। पौराणिक महात्‍म्‍य के अनुसार इस दिन माता अंजना के गर्भ से रामदूत श्री हनुमान प्रकट हुए थे। भगवान श्रीराम की सेवा करने में हनुमानजी जैसा भक्त कोई नहीं हे। वे राम-काज करने में सदा आतुर रहते है। श्रीरामचरितमानस में भगवान शंकर कहते हैं कि -
हनूमान सम नहीं बड़भागी। नहिं कोउ रामचरण अनुरागी।।
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।


हनुमान जयन्‍ती वर्ष में दो बार मनाई जाती है। संवत्‍सर के आरंभ होते ही एक चैत्र मास की पूर्णिमा को और दूसरी कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दर्शी को, अर्थात दीपावली से ठीक एक दिन पहले। अमांत आश्विन मास 'कार्तिक' की कृष्‍ण चतुर्दशी को महानिशा (अर्द्धरात्रि) में माता अंजना के गर्भ से हनुमानजी का जन्‍म हुआ। जगद्गुरू श्रीरामानन्‍दाचार्य अपने ग्रंथ 'वैष्‍णवमताब्‍ज भास्‍कर' में इसे मान्‍यता करते हैं
स्‍वात्‍यां कुजे शैवतिथौ तु कार्तिके, कृष्‍णेअंजनागर्भत एव साक्षात्।
मेषे कपीट् प्रादुरभूच्छिव: स्‍वयं व्रतादि ना तत्र तदुत्‍सवं चरेत्।।

अर्थात् कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि, मंगलवार को स्‍वाति नक्षत्र तथा मेष लग्‍न में सायंकाल साक्षात भगवान शंकर ही माता अंजना के उदर से हनुमानजी के रूप में प्रकट हुए। अत: इस दिन व्‍यक्ति को पूर्ण श्रृद्धा-भावना के साथ हनुमानजी की प्रसन्‍नता के लिए व्रत व हनुमत्-जन्‍मोत्‍सव मनाना चाहिए।
'श्रीहनुमत्‍संहिता' में भी कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी को ही हनुमानजी का जन्‍मोत्‍सव माना गया है -
ऊर्जे कृष्‍णचतुर्दश्‍यां भौमे स्‍वात्‍यां कपीश्‍वर:। मेषलग्‍नेअंजनागर्भात् शिव: प्रादुरभूत्‍स्‍वयम्।।
इस प्रकार कार्तिक चतुर्दशी को भी हनुमानजी का जन्‍मोत्‍सव माना जाता है। भारतवर्ष के अधिकांश हिस्‍सों में चैत्र पूर्णिमा को ही हनमान जयंती मनाई जाती है।

तिलक का महत्‍व

तिलक एक मांगलिक प्रतीक माना जाता है। किसी भी पूजा, यात्रा, सफलता प्राप्ति आदि मौकों पर तिलक लगाकर शगुन की मंगलवार कामना की जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्‍लेख है :-

स्‍नान दान तपो होमो, देवता पितृ कर्म च ।
तत्‍सर्व निश्‍फल याति, ललाटे तिलक विना ।।

अर्थात् तिलक के बिना समस्‍त जातियों के होम, तप, स्‍नान, देवता पूजन, पितृकर्म और दान निष्‍फल हो जाते हैं।

तिलक लगाने का अपना खास ढंग होता है। अनामिका और अंगुष्‍ठ के योग से व्‍यक्ति के मस्‍तक पर तिलक लगाया जाता है। तिलक का प्रत्‍यक्ष रिश्‍ता मस्तिष्‍क से है। मस्‍तक पर तिलक लगाते ही तन-मन शुद्ध हो जाते हैं। यह मान्‍यता है कि मस्‍तक पर तिलक या बिन्‍दी लगाने से चित्त में नम्रता व एकाग्रता बढ़ती है और तनाव से मुक्ति मिलती है। हमारी दोनों भौहों के मध्‍य आज्ञाचक्र स्थित होता है। इस आज्ञाचक्र पर ध्‍यान लगाने से साधक कामनापूर्ण शक्तिशाली हो जाता है। यह एक ऐसा चेतना केन्‍द्र है जहाँ से संपूर्ण ज्ञान चेतना और क्रियात्‍मक चेतना का संचालन होता है। आज्ञा चक्र ही दिव्‍य नेत्र या तृतीय चक्षु है, जिसकी तुलना टेलीफोन राडार व टेलीस्‍कोप की समन्‍वय युक्‍त ताकत से की जा सकती है। आज्ञाचक्र सुदृढ़ होता है तो सुख व शांति का एहसास होता है। ओज तथा तेज बढ़ता है। तिलक लगाते ही मस्तिष्‍क में शीतलता, तरावट, शांति एवं ठंडक की अनुभूति होती है। तिलक में शुद्ध चन्‍दन, कुमकुम, सिन्‍दूर, हल्‍दी का प्रयोग होता है। तिलक की महिमा को विज्ञान ने भी माना है। वैज्ञानिकों ने भी कई शोधों में कहा है कि आज्ञाचक्र पर किया गया लेप व्‍यक्ति को शांति प्रदान करता है।

होली दहन और वायु की दिशा

शकुन शास्‍त्र में होलिका दहन के समय वायु प्रवाह की दिशा से जन जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का फलित निर्णय किया जाता है। आगामी वर्ष कैसा रहेगा, इसका निष्‍कर्ष भी निकाला जाता है। दिशा के अनुसार होली की लौ (झल) का फलाफल शकुन शास्‍त्र में इस प्रकार बताया गया है :-

पूर्व दिशा की ओर - सुखद
आग्‍नेय (दक्षिण पूर्व) - आगजनी कारक
दक्षिण दिशा - दुर्भिक्ष एवं पशु पीड़ाकारक
नेऋत्‍य (दक्षिण-पश्चिम) - फसल हानि
पश्चिम दिशा की ओर - सामान्‍यत: तेजीप्रद
वायव्‍य (उत्तर पश्चिम) - चक्रवात, पवनवेग
उत्तर व ईषान (उत्तर-पूर्व)- अच्‍छी वर्षा सूचक

होली की झल ऊंचे आकाश को जायेगा तथा वायु शान्‍त हो तो उत्‍वाद सूचक है। यदि इस दिन मेघ गाज, वर्षा, आंधी और तेज वायु वेग हो, तो आने वाले साल में धन-धान्‍य, गल्‍ला, कार्य व्‍यवसाय और व्‍यापार में लाभ होता है।